आवारा मवेशियों का आतंक, फसलों की बर्बादी और दुर्घटनाओं के बीच किसानों ने खोला मोर्चा, एसडीएम कार्यालय की ओर किया कूच

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​पाटन। पाटन विधानसभा क्षेत्र के दक्षिण पाटन इलाके में घुमंतू (आवारा) मवेशियों की विकराल होती समस्या ने किसानों की नींद उड़ा दी है। एक तरफ जहां किसान अपनी मेहनत से उगाई फसल को बचाने के लिए दिन-रात खेतों में पहरा देने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी तरफ मुख्य सड़कों पर डेरा डाले पशुओं के कारण जानलेवा हादसों का खतरा मंडरा रहा है। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर आक्रोशित किसानों ने पाटन एसडीएम कार्यालय की ओर कूच किया। हालांकि, प्रशासन ने तेलीगुंडरा के पास किसानों को रोककर उनसे बातचीत की और समस्या के समाधान के लिए ठोस पहल का भरोसा दिलाया।

​1. आख़िर कौन है इन मवेशियों का धनी-धोरी?

​किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि खुले में छोड़ दिए गए इन पशुओं का असली मालिक कौन है—पशुपालक, आम जनता या शासन-प्रशासन? पशुपालकों द्वारा अपने मवेशियों को बिना देखरेख के बेसहारा छोड़ देने की लापरवाही का खामियाजा किसानों को फसल बर्बादी के रूप में भुगतना पड़ रहा है।

​2. चारागाहों पर अवैध कब्जा और सरकारी जमीनों का दोहन
​ग्रामीण क्षेत्रों में चारागाह की कमी ने इस संकट को और गहरा कर दिया है:

​अतिक्रमण, सरकारी जमीनों और पारंपरिक चारागाहों पर लगातार अवैध कब्जे हो रहे हैं।
​खनन और ईंट भट्ठे, मुरम निकालने के लिए जमीन की खुदाई और लाल ईंट भट्ठों के संचालन से मवेशियों के चरने योग्य जगह खत्म होती जा रही है।
जब पशुओं के लिए चरने की जगह ही नहीं बचेगी, तो उनके सामने भूख-प्यास का संकट खड़ा होना स्वाभाविक है।

​3. जर्जर गौठान और बदहाल व्यवस्था

​पूर्ववर्ती सरकार के दौरान गांवों में बनाए गए गौठानों की स्थिति अब दयनीय हो चुकी है.कई गौठान पूरी तरह जर्जर होकर बेकार पड़े हैं।
​जहां गौठान सक्रिय हैं, वहां मवेशियों के लिए पर्याप्त चारा, पानी और छांव के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं।

​किसानों ने कौही स्थित गौशाला की क्षमता और वहां की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ मवेशियों को पकड़कर बंद कर देना ही काफी नहीं है, बल्कि उनके रखरखाव की स्थायी व्यवस्था होनी चाहिए।

​4. फसल के साथ इंसानों और मवेशियों की जान दांव पर

​यह मुद्दा केवल कृषि नुकसान तक सीमित नहीं है। सड़कों पर मवेशियों का जमघट आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं की मुख्य वजह बन रहा है, जिससे बेजुबान पशुओं के साथ-साथ राहगीरों और वाहन चालकों की जान भी लगातार खतरे में बनी रहती है।

​समाधान की राह, सामूहिक जिम्मेदारी से ही निकलेगा हल

​किसान संगठन और स्थानीय ग्रामीणों का स्पष्ट मानना है कि इस समस्या का स्थायी समाधान केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए त्रिस्तरीय रणनीति की आवश्यकता है.
​ पशुपालक अपने मवेशियों को सड़कों और खेतों में आवारा छोड़ने के बजाय उनके रहने व खाने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी संभालें।
​ शासन जर्जर गौठानों का जीर्णोद्धार करे, कौही गौशाला का विस्तार करे और चारागाह की जमीनों को अतिक्रमण से मुक्त कराए।
​ मवेशियों की सुरक्षा और सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए ग्रामीणों और प्रशासन को मिलकर एक प्रभावी मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना होगा।

​जब तक पशुपालक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे और प्रशासन गौठानों की व्यवस्था को मजबूत नहीं करेगा, तब तक फसलों, मवेशियों और इंसानी जिंदगी पर मंडराता यह खतरा टलना मुश्किल है।

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